Loading
वो कांग्रेसी अध्यक्ष जिनके नेहरू-गांधी परिवार से मतभेद रहे
HINDI NEWS18
Fri, 12 Jul 2019 11:55

वो कांग्रेसी अध्यक्ष जिनके नेहरू-गांधी परिवार से मतभेद रहे

HINDI NEWS18
Fri, 12 Jul 2019 11:55

कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष पद का मसला अभी तक नहीं सुलझा है.

वो कांग्रेसी अध्यक्ष जिनके नेहरू-गांधी परिवार से मतभेद रहे
राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद कांग्रेस में नए अध्यक्ष को लेकर कई नाम उछले लेकिन किसी भी नाम पर अब तक मुहर नहीं लगी है. वहीं राहुल गांधी गांधी फैमिली से बाहर के किसी कांग्रेस सदस्य को अध्यक्ष बनवाने पर अड़े हैं. लेकिन वो कौन होगा? कांग्रेस को कितना आगे ले जाएगा? एक सवाल ये भी है कि कहीं अध्यक्ष पद मिलते ही वो गांधी परिवार के हितों के िलाफ तो नहीं चला जाएगा? इन कई सारे सवालों के बीच अध्यक्ष पद का मसला अटका है.अब तक हुए कांग्रेस अध्यक्ष के इतिहास में जाकर देें तो इनमें से कई सवालों के जवाब मिल जाते हैं, जिसकी वजह से कांग्रेस का अध्यक्ष पद अभी तक ाली है. एक सवाल बार-बार उठता है कि इतिहास में ऐसे कितने कांग्रेस अध्यक्ष हुए हैं, जिन्होंने नेहरू-गांधी परिवार के इशारों पर चलने से मना कर दिया?आजादी के बाद गांधी फैमिली से बाहर के कई कांग्रेसी अध्यक्ष चुने गए हैं. अब तक कांग्रेस में 18 अध्यक्ष रहे हैं. जिसमें गांधी परिवार से 5 और परिवार से बाहर के 13 कांग्रेसियों ने अध्यक्ष की कुर्सी संभाली है. ऐसे भी गैर गांधी कांग्रेस अध्यक्ष हैं, जिन्होंने गांधी परिवार के इशारों पर चलने से मना किया और उनके हितों की अनदेी की और उन्हें इसका ामियाजा उठाना पड़ा.आजादी के बाद पहले अध्यक्ष जेबी कृपलानी से नेहरू के रहे मतभेद1947 में जब देश आजाद हुआ तो जे बी कृपलानी कांग्रेस के अध्यक्ष थे. कृपलानी महात्मा गांधी के पक्के शिष्य थे. लेकिन नेहरू और पटेल के विचारों से कई बार उनकी असहमति होती. ासकर 1948 में गांधी की हत्या के बाद नेहरु और कृपलानी के बीच कांग्रेस अध्यक्ष के अधिकारों को लेकर अनबन हो गई. नेहरू इस बात से सहमत नहीं थे कि हर बात के लिए पार्टी की सहमति जरूरी हो. नेहरू सरकार के कामों में अध्यक्ष की दलअंदाजी के िलाफ थे.आजादी के बाद जेबी कृपलानी पहले कांग्रेस अध्यक्ष बने

कृपलानी और नेहरू के बीच के संबंध तनावपूर्ण हो गए थे. लेकिन 1950 में नेहरू ने पुरुषोत्तम दास टंडन के अध्यक्ष पद की दावेदारी के िलाफ कृपलानी की उम्मीदवारी का समर्थन किया था. हालांकि जीत पटेल समर्थक पुरुषोत्तम दास टंडन की हुई. बाद में कृपलानी कांग्रेस से अलग हो गए. उन्होंने किसान मजदूर प्रजा पार्टी बना ली, जिसका सोशलिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया में विलय हो गया.

Loading...
पुरुषोत्तम दास टंडन को नेहरू विरोध की वजह से इस्तीफा देना पड़ाकृपलानी के बाद 1948 और 1949 में पट्टाभि सीतारमैया कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. वो नेहरू के करीबी थी. लेकिन इसके बाद 1950 में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए पुरुषोत्तम दास टंडन सरदार वल्लभभाई पटेल के करीबी थी. नेहरू के साथ उनके संबंध शुरूआती दौर में ठीक लेकिन बाद में उनके विचारों में असहमति होने लगी. ासकर भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के वक्त टंडन पटेल के विचारों के हिमायती बन गए.पुरुषोत्तम दास टंडन पटेल के ज्यादा करीब थे
नेहरू की सेक्यूलरिज्म की परिभाषा से उन्हें आपत्ति थी. टंडन के अध्यक्ष पद पर रहते हुए भी नेहरू के साथ उनके संबंध सामान्य नहीं रहे. नेहरू को अपनी ही पार्टी के भीतर से विरोध झेलना पड़ रहा था. बाद में स्थितियां ऐसी हुई कि ये बात तय हो गई कि कांग्रेस अध्यक्ष को देश के प्रधानमंत्री के िलाफ नहीं जाना चाहिए. पुरुषोत्तम दास टंडन ने इस्तीफा दे दिया. नेहरु कांग्रेस के अध्यक्ष बने. इसके बाद ज्यादातर वक्त नेहरु-गांधी फैमिली के करीबी ही कांग्रेस अध्यक्ष पद पर रहे.नरसिम्हा राव को गांधी परिवार के विरोध का सामना करना पड़ाउसके बाद गांधी परिवार की मर्जी के िलाफ जाने वालों में पीवी नरसिम्हा राव का नाम लिया जा सकता है. नरसिम्हा राव 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बने. राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए नरसिम्हा राव ने राजनीति से संन्यास लेने की इच्छा जाहिर की थी. लेकिन उनकी हत्या के बाद हालात ऐसे बने कि उन्हें अध्यक्ष पद की कुर्सी के साथ देश को भी संभालना पड़ा. नरसिम्हार राव के दौर में ही आर्थिक उदारीकरण का दौर आया और देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटी.कांग्रेस के सत्ता से बाहर होते ही नरसिम्हार राव की अहमियत त्म हो गई. सोनिया गांधी ने जब कांग्रेस का प्रभार संभाला तो उनके रिश्ते काफी राब हो चुके थे. नरसिम्हा राव की सरकार ने बोफोर्स घोटाले पर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चैलेंज करने का निर्णय लिया था. दिल्ली हाईकोर्ट ने बोफोर्स स्कैंडल की सीबीआई जांच को गैरजरूरी देकर फाइल बंद करने का फैसला दिया था. सोनिया गांधी से उनके रिश्तों के राब होने की यही वजह बनी.नरसिम्हा राव को सोनिया गांधी की नाराजगी झेलनी पड़ी
सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए उनका नाम कांग्रेस वर्किंग कमिटी में भी नहीं रहा. 2004 में जब नरसिम्हा राव का निधन हुआ तो उनका पार्थिव शरीर दिल्ली के अकबर रोड स्थित कांग्रेस के दफ्तर लाया गया. लेकिन उनके पार्थिव शरीर को गेट के भीतर ले जाने तक की अनुमति नहीं दी गई. आज नरसिम्हार राव को कांग्रेस से ज्यादा बीजेपी के लोग याद करते हैं. कई मौकों पर प्रधानमंत्री मोदी ने राव का नाम लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा है.सीताराम केसरी के साथ कांग्रेस ने बुरा बर्ताव कियासीताराम केसरी के साथ भी कांग्रेस ने बुरा बर्ताव किया. नरसिम्हा राव के बाद सीताराम केसरी को कांग्रेस अध्यक्ष की कमान सौंपी गई थी. वो गांधी परिवार के विश्वासपात्र थे. लेकिन 1997 में सोनिया गांधी के राजनीति में प्रवेश के बाद 1998 में स्थितियां बदल गईं. कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने एक रिजोल्यूशन पास करके सीताराम केसरी को हटाकर सोनिया गांधी को कांग्रेस की कमान देने की सिफारिश कर दी. केसरी ने अध्यक्ष पद छोड़ने से मना कर दिया.सीताराम केसरी को जबरदस्ती कांग्रेस दफ्तर से बाहर किया गया
सीताराम केसरी को जबरदस्ती कांग्रेस दफ्तर से बाहर किया गया. कुछ लोगों का कहना है कि कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने के बाद जब सोनिया गांधी कांग्रेस दफ्तर में पहुंची तो सीताराम केसरी को जबरदस्ती वहां के टॉयलेट में बंद कर दिया गया था. जब सोनिया गांधी ने अध्यक्ष की कुर्सी संभाल ली तब उन्हें टॉयलेट से बाहर निकाला गया. बाद में उन्हें सुरक्षा गार्डों के जरिए दफ्तर से बाहर कर दिया गया.कांग्रेस में गांधी परिवार से बाहर कई अध्यक्ष ऐसे हुए, जिन्होंने नेहरू-गांधी परिवार के विचारों से असहमति जताई. कई मौकों पर विरोध दर्ज करवाए. लेकिन वो इसके बाद कांग्रेस के भीतर नहीं रह पाए. कहा जाता है कि सीताराम केसरी की हालत देककर ही शरद पवार, तारिक अनवर और पीए संगमा जैसे नेताओं ने पार्टी छोड़ दी. शायद यही वजह है कि आज गांधी परिवार से बाहर कांग्रेस का अध्यक्ष ढूंढे नहीं मिल रहा.ये भी पढ़ें:  जानिए आजादी के बाद कांग्रेस में कितने हुए गैर गांधी अध्यक्ष और क्या हुआ उनका हश्रये नेता दो बार बन सकता था पीएम, लेकिन बेटे की कुछ तस्वीरों के चलते त्म हो गई पॉलिटिक्सक्या है आर्टिकल 370 और क्यों श्यामा प्रसाद मुर्जी ने किया था इसका विरोध
Indianews