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वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान दर्जा दिलाने के लिए याचिका
HINDI NEWS18
Mon, 22 Jul 2019 18:20

वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान दर्जा दिलाने के लिए याचिका

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Mon, 22 Jul 2019 18:20

वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान दर्जा देने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका.

वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान दर्जा दिलाने के लिए याचिका
(फाइल फोटो)
News18HindiUpdated: July 22, 2019, 6:20 PM IST

राष्ट्रगीत (वंदे मातरम) को राष्ट्रगान (जन गण मन) के समान दर्जा दिलाने की मांग को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है. सोमवार को दािल की गई याचिका में वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान दर्जा देने की मांग की गई है. इस याचिका पर मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई हो सकती है.दरअसल यह याचिका भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के प्रवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने दायर की है. याचिका में कहा गया है कि वंदे मातरम को आज तक राष्ट्रगान के समान दर्जा नहीं मिला. ऐसे में हाईकोर्ट को इस मामले में दल देना चाहिए. याचिका में उपाध्याय ने मांग की है कि सभी स्कूलों में वंदे मातरम को राष्ट्रगान के तौर पर बजाया जाना चाहिए. साथ ही उन्होंने इसके संबंध में एक दिशा निर्देश बनाने की भी मांग की है.वंदे मातरम का इतिहास वंदे मातरम को सबसे पहले आजादी के आंदोलनों के दौरान बंगाल में गाया जाता था. धीरे-धीरे ये पूरे देश में लोकप्रिय हो गया. इसे कांग्रेस के अधिवेशनों में भी गाया जाता था लेकिन बाद में इसे लेकर मुस्लिमों को आपत्ति होने लगी. कुछ मुसलमानों को वंदे मातरम गाने पर इसलिए आपत्ति थी, क्योंकि इस गीत में देवी दुर्गा को राष्ट्र के रूप में देा गया है.आपत्ति के और कारणमुसलमानों का भी मानना था कि ये गीत जिस आनंद मठ उपन्यास से लिया गया है, वह मुसलमानों के िलाफ लिा गया है. इन आपत्तियों के मद्देनजर सन् 1937 में कांग्रेस ने इस विवाद पर गहरा चिंतन किया और जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति गठित कर दी जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे.समिति ने पाया कि इस गीत के शुरुआती दो पद तो मातृभूमि की प्रशंसा में कहे गए हैं, लेकिन बाद के पदों में हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र होने लगता है, लिहाजा फैसला लिया गया कि इस गीत के शुरुआती दो पदों को ही राष्ट्र-गीत के रूप में प्रयुक्त किया जाए.इस तरह गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर के जन-गण-मन अधिनायक जय हे को यथावत राष्ट्रगान रहने दिया गया. मोहम्मद इकबाल के कौमी तराने सारे जहां से अच्छा के साथ बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा रचित शुरुआती दो पदों का गीत वंदे मातरम राष्ट्रगीत के तौर पर स्वीकृत हुआ.कांग्रेस के अधिवेशनों में गाया जाता था वंदे मातरमसन 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने यह गीत गाया. पांच साल बाद यानी सन 1901 में कलकत्ता में हुए एक अन्य अधिवेशन में चरणदास ने इसे फिर गाया. 1905 के बनारस अधिवेशन में इस गीत को सरलादेवी चौधरानी ने स्वर दिया. बाद में कांग्रेस के कई अधिवेशनों की शुरुआत इससे हुई.बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय (फाइल फोटो)
1950 में घोषित किया गया राष्ट्रगीत आजादी के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में 24 जनवरी 1950 में वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने संबंधी वक्तव्य पढ़ा, जिसे स्वीकार कर लिया गया.सुप्रीम कोर्ट का फैसलासर्वोच्च न्यायालय ने वंदे मातरम संबंधी एक याचिका पर फैसला दिया था कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान का सम्मान तो करता है पर उसे गाता नहीं तो इसका मतलब ये नहीं कि वह इसका अपमान कर रहा है. इसलिए इसे नहीं गाने के लिए उस व्यक्ति को दंडित या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता. चूंकि वंदे मातरम इस देश का राष्ट्रगीत है अत: इसको जबरदस्ती गाने के लिए मजबूर करने पर भी यही कानून व नियम लागू होगा.ये भी पढ़ें - बाराबंकी: भीड़ द्वारा जलाए गए दलित युवक की इलाज के दौरान मौतमौलाना कल्बे जव्वाद व महमूद प्राचा के िलाफ तहरीर
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